मौत का ‘अधिकार’ फैसले के लिए SC ने दिया वंचित तर्क

मौत का ‘अधिकार’ फैसले के लिए SC ने दिया वंचित तर्क

- in राष्ट्रीय
0

नई दिल्ली

मरणासन्न व्यक्ति की वसीयत के आधार पर इच्छा मृत्यु को मंजूरी दिए जाने का फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश में स्वास्थ्य सेवाओं के गरीब लोगों की पहुंच से दूर होने की भी बात कही। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे देश में जहां ज्यादातर लोग हेल्थ सर्विसेज को अफोर्ड करने में सक्षम नहीं हैं, वहां ऐसे मरीज को लाइफ सपॉर्ट सिस्टम पर लंबे समय तक रखना तर्कसंगत नहीं है, जिसके वापस लौटने की आशा न के समान हो। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली 5 जजों की बेंच में शामिल जस्टिस एके सीकरी ने कहा कि मरणासन्न व्यक्ति पर हर दिन बड़ी राशि खर्च करना गरीब परिवारों की आर्थिक हालत को बर्बाद कर सकता है।

112 पेज के अपने जजमेंट में जस्टिस सीकरी ने इकॉनमिक्स ऑफ यूथेनेशिया’ नाम से लिखे चैप्टर में कहा, ‘जब हम पैसिव यूथेनेशिया के आर्थिक सिद्धांत की बात करते हैं तो यह भी इसे मंजूरी देने का बड़ा कारण है। इसके दो पहलू हो सकते हैं।’ पहला, जो परिवार गरीबी में गुजर कर रहे हैं क्या वे अपने किसी परिवार के ऐसे सदस्य पर बड़ी राशि खर्च कर सकते हैं, जो मरणासन्न हो और लौटने की आशा न हो। ऐसे में उनका घर और जीवन के लिए जरूरी अन्य चीजें तक बिक सकती हैं। दूसरा, जब मेडिकल फैसिलिटीज सीमित हों तो फिर उसका बड़ा हिस्सा उन लोगों पर क्यों लगाना चाहिए, जिनके वापस लौटने की ही आशा न हो?

आत्महत्या के प्रयास को अपराध से हटाने की ओर पहला कदम
सुप्रीम कोर्ट की ओर से पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी दिए जाते वक्त यह कहना कि सम्मान के साथ मरना भी जीवन के अधिकार का हिस्सा है, आत्महत्या को अपराध के दायरे से हटाने की ओर पहला कदम भी माना जा सकता है। आईपीसी की धारा 309 के तहत आत्महत्या का प्रयास करने या फिर ऐसा कोई ऐक्ट करने पर 1 साल सजा या जुर्माने या दोनों का प्रावधान है। 2016 में बीजेडी सांसद बैजयंत पांडा ने प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था, जिसमें आत्महत्या के प्रयास को अपराध के दायरे से बाहर करने के लिए प्रावधान तय करने की मांग की गई थी।

Leave a Reply