NDA की सीटों के समीकरण बैठे, अब शुरू होगा असली खेल

NDA की सीटों के समीकरण बैठे, अब शुरू होगा असली खेल

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नई दिल्ली

बिहार में आम चुनाव के लिए दो खेमे तैयार हैं। एनडीए में रविवार को सीटों का बंटवारा भी हो गया तो दूसरी ओर छोटे-बड़े कई दलों ने साथ आकर महागठबंधन का अपना कुनबा जोड़ लिया है। अबतक की तस्वीर बताती है कि बीजेपी ने 2019 में बड़ी जीत के लिए बड़ा दिल दिखाते हुए जेडीयू से ‘बराबरी’ वाला समझौता किया है। आरजेडी-कांग्रेस के नेतृत्व वाला महागठबंधन भी जातीय समीकरणों को हल करने में जुटा हुआ है। दोनों गठबंधन के सामने अभी एक और बड़ी चुनौती है, सीट बंटवारा और टिकट वितरण। बीजेपी को अपने नेताओं का टिकट काटना होगा तो जेडीयू ऐसी सीटों पर दावा करेगी, जहां जीतने की उम्मीद अधिक हो। यही चुनौती महागठबंधन के सामने भी है। दोनों तरफ से कई दावेदार पहले ही खड़े हो चुके हैं। ऐसे में नेताओं के बागी होने का भी डर है।

बड़ी जीत के लिए दिखाया बड़ा दिल
नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली बीजेपी ने बिहार में गठबंधन के समीकरण को ठीक रखने के लिए बड़ा त्याग किया। 2014 में 29 सीटों पर चुनाव लड़कर 22 सीट जीतने वाली पार्टी इस बार केवल 17 जगह अपने उम्मीदवार उतारेगी। नीतीश कुमार को बड़ा भाई मानते हुए गठबंधन में बराबरी का दर्जा दिया गया है। 2014 में 2 सीट जीतने वाली जेडीयू को 17 सीटें मिलना इसका सबूत है। एलजेपी को भी 6 सीटें मिल गई हैं।

दरअसल, उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी को खो चुकी बीजेपी बिहार में रामिवलास और नीतीश में से किसी का साथ छूटने का जोखिम नहीं ले सकती थी। ऐसे में 2019 में केंद्र में दोबारा सत्ता पाने के लिए पार्टी ने यह त्याग किया। बीजेपी बिहार में अपने दम पर लगभग 25 फीसदी वोट ले पाने में सफल होती है। मोदी लहर में भी उसे 30 फीसदी से कम ही वोट मिले थे। पार्टी को पता है कि उसे सहयोगी की जरूरत है। एनडीए को लगता है कि नीतीश कुमार और रामविलास पासवान के रहने से यह गठजोड़ मजबूत है। अगले साल राज्य में उसे इसका फायदा मिलेगा। 2009 में भी जब पूरे देश में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया था, बिहार में नीतीश और बीजेपी की जोड़ी 32 सीटें लाने में कामयाब रही थी।

हर वर्ग में पैठ का प्रयास
आरजेडी-कांग्रेस की अगुआई वाला महागठबंधन भी आम चुनाव में बेहतर समीकरण की बदौलत सफलता की खीर पकाने में जुट गया है। उपेंद्र कुशवाहा के बाद रविवार को मुकेश साहनी को अपना हिस्सा बनाकर महागठबंधन ने जातीय समीकरणों को दुरुस्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। राज्य में मुसहर, साहनी और कुशवाहा जातियों को मिलाकर लगभग 15 फीसदी आबादी है, जो 10 लोकसभा सीटों को प्रभावित करती है। मुस्लिम-यादव फैक्टर की बदौलत 30 फीसदी वोट पर आरजेडी की पकड़ पहले ही मजबूत है।

महागठबंधन के लिए पहले गैरयादव ओबीसी वोट पाना बड़ी चुनौती थी। साहनी और कुशवाहा की बदौलत अब उसे यह तबका भी अपने साथ आता दिख रहा है। दलित मतदाताओं को रिझाने की भी पूरी कोशिश है। इसी के तहत मायावती को राज्य में एक लोकसभा सीट दी जाएगी। जीतन राम मांझी पहले ही इस गठबंधन का हिस्सा हैं। वहीं, कांग्रेस सवर्ण मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। राज्य में खुद का जनाधार बढ़ाने के लिए कांग्रेस 3 फरवरी को पटना के गांधी मैदान में 27 साल बाद अपने दम पर रैली कर रही है। इसे पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी संबोधित करेंगे। आरजेडी नेता मनोज झा ने कहा है कि इस बार समाज के सभी तबकों को साथ ले आने में बड़ी कामयाबी मिली है। राज्य में महागठबंधन सही अर्थों में समाज के सभी तबकों का संतुलित प्रतिनिधित्व करता है।

’56 इंच वाले झुक गए’
एनडीए में टिकट बंटवारे को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने तंज कसा है। बीजेपी और जेडीयू के बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर कुशवाहा ने कहा कि 56 इंच के सीने वाले नीतीश के सामने नतमस्तक हो गए। आधा-आधा बंटवारा कर दिया। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी बीजेपी को घेरा है। उन्होंने ट्वीट किया, ‘एलजेपी और जेडीयू को 2 साल बाद पीएम नरेंद्र मोदी से नोटबंदी पर सवाल पूछने का फायदा मिला। जनादेश चोरी के बाद भी बीजेपी बिहार में इतनी मजबूत हुई कि 22 वर्तमान सांसद होने के बावजूद 17 सीट पर चुनाव लड़ेगी। दो एमपी वाले नीतीश भी 17 सीट पर लड़ेंगे। समझ जाइए कि एनडीए के हालात कितने पतले हैं।’

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