तेलंगाना: सरकारी राशन के लिए वोट डालती हैं सेक्स वर्कर्स

तेलंगाना: सरकारी राशन के लिए वोट डालती हैं सेक्स वर्कर्स

मेडक (तेलंगाना)

चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही लोगों में एक उम्मीद होती है। यह उम्मीद होती है बदलाव की, अपेक्षा की जाती है विकास की, जीवन स्तर के सुधरने और बदलने की। हालांकि, उत्तर तेलंगाना में 2 हजार से अधिक जोगिनियों (देह व्यापार करने वाली महिलाएं) के लिए चुनाव खासा मायने नहीं रखता है। इसकी वजह यह है कि उनका चुनाव प्रचार के दौरान कोई जिक्र ही नहीं होता।

आपको बता दें कि एक प्राचीन प्रथा के कारण देह व्यापार करने वाली महिलाओं को जोगिनी के तौर पर जाना जाता है। इस प्रथा को देवदासी व्यवस्था के तौर पर भी जाना जाता है, जो खासकर दक्षिण भारत के दलित समुदाय में व्याप्त है, जबकि कानून के तहत करीब चार दशक पहले इसे प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस प्रथा के तहत अभिभावक अपनी बेटियों की शादी मंदिर के देवताओं से कर देते हैं और लड़कियों के जवान होते ही उन्हें देह व्यापार करने के लिए बाध्य किया जाता है।

‘कहीं राशन मिलना बंद न हो जाए’
नेताओं की ओर से उपेक्षा होने के बावजूद जोगिनियां चुनाव से मुंह नहीं मोड़ सकतीं क्योंकि उन्हें सरकारी राशन न मिलने का डर होता है। 30 वर्षीय जोगिनी मनीषा आनंदा (बदला हुआ नाम) बताती हैं, ‘चुनाव आते-जाते हैं लेकिन मेरी जिंदगी में कुछ भी नहीं बदला है। सब्सिडी वाला राशन न मिलने के डर से मैं अब भी हर बार वोट डालती हूं।’

‘पहले एक शख्स के साथ थी, अब चार गांवों की जागीर’
सरदाना गांव की एक दलित कॉलोनी में रहने वाली आनंदा ने अपनी दुर्दशा को याद करते हुए कहा, ‘जवान होते ही मुझे गांव के ही एक व्यक्ति को इस्तेमाल करने के लिए दे दिया गया। जब वह मुझसे थक गया तो मैं पूरे गांव की जागीर बन गई, जहां कोई भी व्यक्ति, कभी भी, कहीं भी मेरा इस्तेमाल कर सकता था।’ वर्तमान में वह चार गांवों की जागीर हैं लेकिन वह मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में काम करने वाली यौन कर्मियों की तुलना में काफी कम कमा पाती है। अपने बेटे की शिक्षा के लिए वह खेतों में दिहाड़ी मजदूरी भी करती हैं लेकिन वहां से भी काफी कम आय होती है।

‘कलेक्ट्रेट में झाड़ू मारने का काम दिया जाए’
आनंदा ने कहा, ‘सरकार से मेरी सिर्फ इतनी मांग है कि कलेक्ट्रेट में झाड़ू मारने या सफाई करने का काम दिया जाए। इससे मेरे बेटे की पढ़ाई में मदद मिलेगी।’ अधिकतर जोगिनियों की आय उनके ग्राहकों से मिलने वाले धन या गांव के मंदिरों में या किसी शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाते वक्त नाचने के दौरान मिलने वाले चावल या रुपये तक ही सीमित है।

‘2000 वर्ष पुरानी प्रथा आज भी संस्कृति का हिस्सा’
तीन बच्चों की मां 65 वर्षीय निंगम्मा जामसिंग (बदला हुआ नाम) लिंगपुर गांव में रहती हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें राज्य सरकार से वरिष्ठ नागरिक पेंशन मिलती है लेकिन यह अपर्याप्त है। वह बताती हैं, ‘मैं कभी भी इस प्रथा का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी लेकिन 2000 वर्ष पुरानी प्रथा अब भी तेलंगाना की संस्कृति का हिस्सा बनी हुई है।’ ज्यादातर जोगिनियां तेलंगाना के मेडक और निजामाबाद जिले में रहती हैं। नक्सल समूहों ने भी जोगिनियों को पुरानी प्रथा की जंजीरों से अलग करने का प्रयास किया था लेकिन वे जोगिनियों को मनाने में सफल नहीं रहे।

‘…लेकिन वे डर से नहीं मानीं बात’
आत्मसमर्पण कर चुके नक्सली टाम टाम यादगिरी ने कहा, ‘हमने उन्हें इस क्रूर प्रथा से बाहर निकालने के लिए काफी प्रयास किया। हमने उनसे बात की और जागरूकता फैलाई लेकिन लोगों के डर से वे सहमत नहीं हुईं।’

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