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बस अटकलों के आधार पर किसी की आज़ादी का गला नहीं घोंट सकते- SC

नई दिल्ली,

वामपंथी विचारकों की गिरफ्तारी और ‘अर्बन नक्सल’ पर छिड़ी बहस के बीच नागरिकों की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की. कोर्ट ने बुधवार को कहा कि हमारे संस्थानों को इतना तो मजबूत होना होगा कि वे असहमति के साथ भी रह सकें.सुप्रीम कोर्ट ने कोरेगांव-भीमा हिंसा मामले के सिलसिले में गिरफ्तार पांच कार्यकर्ताओं की नजरबंदी की अवधि बुधवार को एक दिन के लिए बढ़ा दी है.

सुप्रीम कोर्ट में भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में 5 लोगों की गिरफ्तारी के संबंध में सुनवाई चल रही थी. बेंच ने मामले में सुनवाई करते हुए जोर दिया कि विरोधी विचारधारा और कानून व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के बीच फर्क को समझ जाना चाहिए.चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, “हम केवल अटकलों के आधार पर किसी की आज़ादी का गला नहीं घोंट सकते. हमें इन सभी तरह की कोशिशों पर कड़ी नज़र रखनी होगी.”

जज ने कहा कि जो लोग संस्थानों में बैठे हुए हैं. उन्हें हर चीज शायद पसंद ना आए, जो उनके बारे में कहा जा रहा है. पर इस आधार पर असहमतियों को चुप नहीं कराया जा सकता.वहीं जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “हमारे संस्थानों को इतना तो मजबूत बनना होगा, चाहें उनका विरोध हो, इस कोर्ट का भी क्यों ना हो. जहां तक चुनी हुई सरकार का सवाल है तो कानून व्यवस्था को दबाने की कोशिश होने पर कुछ अलग करना होगा.”

उन्होंने कहा, “हम चाहें या ना चाहें हमें ये स्वीकार करना होगा कि असहमति हो सकती है… हमें एक विपक्ष और डिस्टर्बेंस या सरकार को उखाड़ फेंकने की कोशिश में बिल्कुल साफ फर्क देखना होगा.”सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी तब आई है जब एडीशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता महाराष्ट्र सरकार की ओर से कोर्ट में पेश हुए. उन्होंने एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी को वैध साबित करने की कोशिश की. इसके लिए उन्होंने आपराधिक दस्तावेजों का हवाला दिया, जिन्हें जांच के दौरान आरोपियों के पास से बरामद किया गया था.

जस्टिस चंद्रचूड़ की टिप्पणी के बाद, मेहता ने एक बिंदु उठाते हुए कहा कि यह देखना भी अहम है कि ऐसी टिप्पणी कौन कर रहा है. मेहता ने कहा, “असहमति सही है लेकिन ये भी अहम है कि ऐसा कह कौन रहा है. अगर किसी प्रतिबंधित संगठन का नेता ऐसा कहता है तो इसे दूसरे संदर्भ में देखा जाना चाहिए.”

सीनियर वकील हरीश साल्वे ने भी इस नज़रिए का समर्थन किया. हरीश केस की एफआईआर दर्ज कराने में शामिल थे. उन्होंने कहा, “विरोधी राय और एक आपराधिक कृत्य में एक फर्क देखा जाना चाहिए. कोई गुस्से में ऐसा कह सकता है कि मैं संविधान को जला दूंगा क्योंकि ये किसी वर्ग के लिए अनफेयर साबित हुआ. लेकिन ये भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि ये देखा जाए कि ऐसा कह कौन रहा है. आप क्या कह रहे हैं और कहां कह रहे हैं.” इसी बिंदु पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने स्वतंत्रता पर जोर देते हुए कहा कि केवल अटकलों के आधार पर किसी की आज़ादी का गला नहीं घोंटा जा सकता. इस मामले में गुरुवार को भी सुनवाई जारी रहेगी. तब तक आरोपी एक्टिविस्ट नज़रबंद ही रहेंगे.

क्या है पूरा मामला
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ की पीठ इन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर गुरुवार को आगे सुनवाई करेगी. इन गिरफ्तारियों के खिलाफ इतिहासकार रोमिला थापर और चार अन्य ने याचिका दायर की हैं.महाराष्ट्र पुलिस ने 28 अगस्त को अनेक स्थानों पर छापे मार कर तेलुगू कवित वरवरा राव, अशोक फरेरा, वर्नेन गोन्साल्विज, शोभा भारद्वाज और गौतम नवलखा को गिरफ्तार किया था.

पीठ ने इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान 17 सितंबर को कहा कि यदि यह पता चला कि पुलिस ने साक्ष्य गढ़े हैं तो वह विशेष जांच दल से इसकी जांच का आदेश दे सकती है. पीठ ने यह भी कहा था कि इन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का आधार बनाई गई सामग्री की विवेचना की आवश्यकता है.

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